हमारी ज़िदंगी में चिंतक-शुभचिंतक और अ-शुभचिंतकों का होना कितना ज़रूरी है, ये किसी को बताने या छुपाने की आवश्यकता नहीं है। जब भी हम ज़रा सा परेशान होते हैं या फिर किसी मुसिबत में होते हैं.. तो सबसे पहले चिंतक और शुभचिंतक ही हमारा हाल जानने के लिए पहुंचे जाते हैं। उनके आने पर हमारे दिल को भी सुकून मिलता है। हम सोचते हैं कि, चलो इस दुनिया में कोई तो है हमारा ख़ैरख़्वाह। लेकिन उधर हमारे अ-शुभचिंतक यह सोच कर दुःखी हो उठते हैं कि इनके पास इतने सारे शुभचिंतक कैसे हो सकते हैं.. और फिर यही अ-शुभचिंतक तत्काल प्रभाव से एक योजना को अंजाम देते हुए घोषणा कर डालते हैं अगली दफा कोई भी अन्य शुभचिंतक इनके दरवाजे पर नही पहुंच पाए।
इन दिनों में ऐसे ही कुछ शुभचिंतकों और अशुभचितकों के बीच फंसा हुआ हूं। आजकल यही शुभचिंतक-अशुभचिंतक मेरी जिदंगी में किसी हिन्दी सिनेमा के खलनायक की भूमिका निभाने में जुटे हैं। या फिर यू कहूं कि यह डकैत बन गए हैं.. क्योंकि इन्होंने मेरी रातों की नीद और दिन का चैन लूट लिया है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि इनकी प्रताड़ना की रपट किस थाने में जाकर दर्ज कराऊं।
कुछ दिनों पहले मोहर्रम के लिए मैं दिल्ली से बाहर गया.. सर्द रातों में जहां झिंगूर भी बोलने से कतराते हैं.. वहीं अचानक से मेरे फोन की घंटी बजी.. बेध्यानी में उठाया गया फोन जैसे ही कान पर रखा तो दूसरी तरफ मेरा शुभचिंतक बोलना शुरू कर चुका था, " सर ! सर ! .. मैं बोल रहा हूं.. मुझे आज ही पता चला..यह तो बहुत बुरा हुआ.. सर ! मुझे लगता है कि आपके खिलाफ किसी ने चाल चली है..।" इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता कि माजरा क्या है.. फोन कट गया।
शहर की भागती दौड़ती-जिदंगी में हमें वक़्त का अहसास नही होता.. यहां तक कि हमें अपने सोने-जागने तक का टाईम मालूम नहीं रहता। कम से कम मेरे साथ तो कुछ ऐसा ही है.. जब नींद आई तो रात मानकर आंखें मूंद लीं.. और आंख खुली तो सुबह मान ली। मगर गांव देहात में आज भी सारा काम समय के हिसाब से ही होता है। लिहाजा अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे मैं सोकर उठा ही था कि एक और शुभचिंतक ने फोन की घंटी बजाई।
कैसे हो ! अब्बास भाई ! यार मैं (शुभचिंतक) नाईट शिफ्ट में था..और अभी-अभी मैंने (शुभचिंतक) बला-बला साइट पर देखा कि आप जा रहे है ?। यार ! आपने कभी बताया नही.. ऐसी भी भला कोई दोस्ती होती है ?। अब की बार मैंने अपने शुभचिंतक की बात को नींद की दहाड़ से काटते हुए सवाल दाग दिया, भाई ! शुभचिंतक ! मैंने आपको क्या नहीं बताया...?...और इसमें बताने वाली तो कोई बात ना थी.. मुझे आना था तो मैं आ गया.. इसमें नाराजगी कैसी दोस्त...? इतना सुनते ही शुभचिंतक बिफरते हुए बोले, "आप दिल्ली आए.. तो बात होगी..।" इतना कह कर उन्होंने फोन काट दिया।
आज दोपहर दिन के दो बजे.. धूप में बैठा हुआ मैं.. दिल्ली की सर्दी को मुंह चिढ़ा रहा था.. कि अचनाक से मेरे एक शुभचिंतक (या फिर शुभचिंतकनी) का फोन आया.. मेरे गुड नून करते ही उसने बोलना शुरू कर दिया।
यार अब्बास !...?...तुम तो बढ़े ही बेवफा निकले.. अकेले ही बनारस शिफ्ट हो गए.. पिछली मुलाक़ात के दौरान एक बार भी नही बताया.. और आज सुबह जैसे ही मुझे पता चला तो मैं (शुभचिंतक / शुभचिंतकनी) फला-फला साइट पर तुम्हारा नाम देखर दंग रह गई। खैर ! वैसे भी बनारस तो तुम्हारे प्रिय शहरों में शामिल है.. बेटे ! अब तो तुम्हारी मौज़ा ही मौज़ा है।
चिंतक-शुभचिंतक/शुभचिंतकनी से इधर-उधर की दो-चार बातें करने के बाद मैनें अपने परिवार से सबसे पहला सवाल यही किया.." मैं बनारस कब शिफ्ट हो गया...?...मुझे ही इसकी जानकारी नहीं...।"
अंतः हे ! मेरे शुभचिंतकों ! आप सभी का धन्यवाद...साथ ही धन्यवाद देता हूं मैं अपने उन शुभचिंतकों का जिन्होंने रात-बेरात फोन लगाकर अपना अपार प्रेम प्रकट किया।
Wednesday, December 22, 2010
हे ! प्रिय चिंतक-शुभचिंतक और अ-शुभचिंतको...
हमारी ज़िदंगी में चिंतक-शुभचिंतक और अ-शुभचिंतकों का होना कितना ज़रूरी है, ये किसी को बताने या छुपाने की आवश्यकता नहीं है। जब भी हम ज़रा सा परेशान होते हैं या फिर किसी मुसिबत में होते हैं.. तो सबसे पहले चिंतक और शुभचिंतक ही हमारा हाल जानने के लिए पहुंचे जाते हैं। उनके आने पर हमारे दिल को भी सुकून मिलता है। हम सोचते हैं कि, चलो इस दुनिया में कोई तो है हमारा ख़ैरख़्वाह। लेकिन उधर हमारे अ-शुभचिंतक यह सोच कर दुःखी हो उठते हैं कि इनके पास इतने सारे शुभचिंतक कैसे हो सकते हैं.. और फिर यही अ-शुभचिंतक तत्काल प्रभाव से एक योजना को अंजाम देते हुए घोषणा कर डालते हैं अगली दफा कोई भी अन्य शुभचिंतक इनके दरवाजे पर नही पहुंच पाए। इन दिनों में ऐसे ही कुछ शुभचिंतकों और अशुभचितकों के बीच फंसा हुआ हूं। आजकल यही शुभचिंतक-अशुभचिंतक मेरी जिदंगी में किसी हिन्दी सिनेमा के खलनायक की भूमिका निभाने में जुटे हैं। या फिर यू कहूं कि यह डकैत बन गए हैं.. क्योंकि इन्होंने मेरी रातों की नीद और दिन का चैन लूट लिया है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि इनकी प्रताड़ना की रपट किस थाने में जाकर दर्ज कराऊं।
कुछ दिनों पहले मोहर्रम के लिए मैं दिल्ली से बाहर गया.. सर्द रातों में जहां झिंगूर भी बोलने से कतराते हैं.. वहीं अचानक से मेरे फोन की घंटी बजी.. बेध्यानी में उठाया गया फोन जैसे ही कान पर रखा तो दूसरी तरफ मेरा शुभचिंतक बोलना शुरू कर चुका था, " सर ! सर ! .. मैं बोल रहा हूं.. मुझे आज ही पता चला..यह तो बहुत बुरा हुआ.. सर ! मुझे लगता है कि आपके खिलाफ किसी ने चाल चली है..।" इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता कि माजरा क्या है.. फोन कट गया।
शहर की भागती दौड़ती-जिदंगी में हमें वक़्त का अहसास नही होता.. यहां तक कि हमें अपने सोने-जागने तक का टाईम मालूम नहीं रहता। कम से कम मेरे साथ तो कुछ ऐसा ही है.. जब नींद आई तो रात मानकर आंखें मूंद लीं.. और आंख खुली तो सुबह मान ली। मगर गांव देहात में आज भी सारा काम समय के हिसाब से ही होता है। लिहाजा अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे मैं सोकर उठा ही था कि एक और शुभचिंतक ने फोन की घंटी बजाई।
कैसे हो ! अब्बास भाई ! यार मैं (शुभचिंतक) नाईट शिफ्ट में था..और अभी-अभी मैंने (शुभचिंतक) बला-बला साइट पर देखा कि आप जा रहे है ?। यार ! आपने कभी बताया नही.. ऐसी भी भला कोई दोस्ती होती है ?। अब की बार मैंने अपने शुभचिंतक की बात को नींद की दहाड़ से काटते हुए सवाल दाग दिया, भाई ! शुभचिंतक ! मैंने आपको क्या नहीं बताया...?...और इसमें बताने वाली तो कोई बात ना थी.. मुझे आना था तो मैं आ गया.. इसमें नाराजगी कैसी दोस्त...? इतना सुनते ही शुभचिंतक बिफरते हुए बोले, "आप दिल्ली आए.. तो बात होगी..।" इतना कह कर उन्होंने फोन काट दिया।
आज दोपहर दिन के दो बजे.. धूप में बैठा हुआ मैं.. दिल्ली की सर्दी को मुंह चिढ़ा रहा था.. कि अचनाक से मेरे एक शुभचिंतक (या फिर शुभचिंतकनी) का फोन आया.. मेरे गुड नून करते ही उसने बोलना शुरू कर दिया।
यार अब्बास !...?...तुम तो बढ़े ही बेवफा निकले.. अकेले ही बनारस शिफ्ट हो गए.. पिछली मुलाक़ात के दौरान एक बार भी नही बताया.. और आज सुबह जैसे ही मुझे पता चला तो मैं (शुभचिंतक/शुभचिंतकनी) फला-फला साइट पर तुम्हारा नाम देखर दंग रह गई। खैर ! वैसे भी बनारस तो तुम्हारे प्रिय शहरों में शामिल है.. बेटे ! अब तो तुम्हारी मौज़ा ही मौज़ा है।
चिंतक-शुभचिंतक/शुभचिंतकनी से इधर-उधर की दो-चार बातें करने के बाद मैनें अपने परिवार से सबसे पहला सवाल यही किया.." मैं बनारस कब शिफ्ट हो गया...?...मुझे ही इसकी जानकारी नहीं...।"
अंतः हे ! मेरे शुभचिंतकों ! आप सभी का धन्यवाद...साथ ही धन्यवाद देता हूं मैं अपने उन शुभचिंतकों का जिन्होंने रात-बेरात फोन लगाकर अपना अपार प्रेम प्रकट किया।
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