Tuesday, June 14, 2011

कशमकशः सुखनलता और रुपेश की प्रेमकथा


Google.Pic
सुखनलता ने रुपेश का हाथ कंधे से हटाते हुए कहां, क्या करते हो...बोरा गए हो क्या ?.
रुपेश एकदम सकपका गया और धीरे से उसने सुखनलता के कंधे से अपना हाथ खिंच लिया।

तुमको हो क्या गया है सुखन ?. रुपेश ने रुआसी आवाज में सवाल किया ?.

सिनेमा हॉल में रुपेश की आवाज इको-लाउडस्पीकर बनकर गूंज गई। लेकिन सुखनलता को इसका इल्हाम नही था क्योंकि वह तो बांग्ला मे बनी फिल्म नौका डूब का हिन्दी संस्करण कशमकश देखने में तालीन थी।
सुखनलता और रुपेश अपने-अपने दफ्तर से टाइम निकाल कर गुरूदेव रवींद्र नाथ टैगोर की लघु कहानियों के संग्रह 'गाल्पो गुच्चो' (Galpo Guchho) में प्रकाशित (1912 ) कहानी नौका डूब पर आधारित बांग्ला फिल्म का हिंदी वर्जन ‘कशमकश’ देखने आए थे।

फिल्म प्रारंभ होने पर रुपेश को कुछ नही समझ आ रहा था। लेकिन सुखनलता जानती थी कि ‘नौका डूब’ पर पहली बार 1947 में नितिन बोस ने हिन्दी और बंगाली में फिल्म बनाई थी। जिसके हिन्दी वर्जन में यूसुफ खान यानि अपने दिलीप कुमार और बंगाली संस्करण में अभि भट्टाचार्य नायक की भूमिका में थे। फिर ऋतुपर्णो घोष ने 1920 के कोलकत्ता और बनारस की पृष्ठभूमि में इस फिल्म को बंगाली भाषा में बनाया।  जिसको सुभाष घई ने हिन्दी दर्शकों के लिए ‘कशमकश’ का नाम दिया।

रुपेश फिल्म बीच में ही छोडकर जाना चाहता था, क्योकि उसे फिल्म समझ नही आ रही थी दूसरे तरफ सुखनलता का झिड़कना भी उसे पसंद ना था ।

सुखनलता ने प्रेम से रुपेश को समझाने का प्रयास किया।

दुनिया जो चाहे स्त्री-पुरुष के रिश्ते को अपनी अलग-अलग मनगढ़त परिभाषाएं देती हो लेकिन वह उनके बीच जन्में विश्वास की सच्चाई को कभी नही समझे पाती।

प्यार के रास्ते में स्त्री-पुरुष हर हालत और हर दौर में अपने रिश्तों की एक ही परिभाषा रचते है। जिसका मूल अर्थ होता है समर्पण और त्याग।

रात के सनाटे में जब नायक रमेश (जिशुसेन गुप्ता) अपनी प्रेमिका हेमनलिनी (राइमा सेन) के सामने प्रेम-विवाह का प्रस्ताव रखता है, तो नायिका लोक-लाज की मर्यादा और सभ्य समाज का परिचय देते हुए संयम के साथ रमेश को आश्वासन देती है कि सुबह होने पर वह अपने पिता से बात करेगी।

लेकिन अपने मंझधार में फंसा रमेश भोर होने तक का इंतेजार नही कर पाया और कई वर्षो तक हेमनलिनी से मिलने नही पहुंचा। अंतः हेम के पिता उसका विवाह बनारस के एक डॉक्टर के साथ तय कर देते है। तभी अपने मंझधार की नाव किनारे लगाकर कर रमेश अचानक से बनारस के घाट में हेमनलिनी से मुलाकात करता है।

हेमनलिनी का मन अपने प्रथम प्रेम की ओर झुक जाता है और वह अपनी शादी के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए पिता से आज्ञा मांगती है।

हेमनलिनी के पिता उसके शादी प्रस्ताव पर पुर्नविचार करने की अनुमति नही देते हुए सवाल खड़ा कर देते है, कि जो व्यक्ति रात के अंधेरे में प्रेम-विवाह प्रस्ताव रखकर वर्षो तक गायब रहा हो, तुम उसके साथ कैसे विवाह कर सकती हो ?.

हेमनलिनी ने सहजतापूर्वक जवाब दिया, पिता जी ! वह गायब नही हो गए थे,बल्कि खो गए थे और हमने उन्हें खोजने की कोशिश ही नही की। अब जब वह मिल गए है तो फिर सोच-विचार कैसा।

हेमनलिनी की बात सुनकर रुपेश के शरीर में कंपन सा होने लगा। क्योंकि कुछ ही दिनों पहले सुखनलता ने भी अपने पिता से यही बात कही थी जब रुपेश अचानक से उसे छोड़ कर चले गए थे।

फिल्म खत्म हो चुकी थी, लेकिन रुपेश की आंखों से नीर बह निकले।

गुरुदेव की कहानी पर आधारित फिल्म बने और उसमे गीत-संगीत उच्च कोटि को ना हो तो गुरु को श्रृद्धांजलि कुछ अधूरी सी रह जाती है। इसलिए सुभाष घई ने मशहूर गीतकार गुलजार को फिल्म के हिन्दी गीत लिखने का जिम्मा सौंपा था। जिसके बाद घई ने एक प्रेसवार्ता में कहा कि, "मैं हिन्दी दर्शकों को इस खूबसूरत फिल्म को देखने से वंचित नहीं करना चाहता, इसलिए मैंने इसे हिन्दी में बनाया है और इसके गीत गुलजार साहब से लिखवाए हैं."

गुलजार साहब ने गुरुदेव के बांग्ला गीतो को हिन्दी में ना सिर्फ रुप दिया बल्कि उसमें पूरे बांग्ला समाज को शामिल कर दिया। इन मधुर गीतो को अपने सुरीले संगीत से सजाने का काम किया, राजा नारायण और देव सुजॉय घोष ने। साथ ही फिल्म की पृष्ठभूमि में रवींद्र के संगीत ने दर्शोको का मन मोह लिया।

सुखनलता ने प्रेम-पूर्वक रुपेश के बालों में हाथ फैरा तो वह एक गीत गुनगुनान लगा। जिसे हरिहरण ने गाया था।
खोया क्या जो पाया हीं नही,खाली हाथ की लकीरें है,
http://www.youtube.com/watch?v=l2lCFEbcfWo

फिल्म में श्रेया घोषल ने दो गीतो को अपनी आवाज दी है। फिल्म का पहला गीत उनकी ही आवाज से शुरु होता है।

मनवा भागे रे....सौ सौ तागे रे...
http://www.youtube.com/watch?v=3jcgCHach6A

दूसरा गीत उन्होनें गाया है, तेरी सीमाएं कोई नही है, बहते जाना है,बहते जाना है....
http://www.youtube.com/watch?v=3vnNb3wLl7o&feature=related

सुभाष घई ने गुरुदेव के गीतों में बांग्ला मूलभाव और प्रेम के लिए गुलजार को चुना तो उसमें बंगाली आत्मा डालने के लिए श्रेया के साथ-साथ मधुश्री को भी चुना। और ऐसा करके उन्होनें कुछ गलत नही किया है, क्योंकि नाव मेरी ठहरे गीत में मधुश्री ने हरिहरण के साथ मिलकर वाकई गीत में आत्मा डाल दी।

नाव मेरी ठहरे जाने कहां...घाट होते नही...सागरों में कहीं... 
http://www.youtube.com/watch?v=iP-8kSHIKbo&feature=related

आनंद-लोके, मंगल-लोके नामक गीत फिल्म में बांग्ला भाषा में ही रखा गया है। ऐसा इसलिए किया गया है, क्योंकि अगर इस गीत के बोल और संगीत को बदल दिया जाता तो गुरुदेव की शान मे गुस्ताखी हो जाती। वैसे भी इस गीत को ना जाने कितने गीतकारों ने अपने सुरे दिए है।
http://www.youtube.com/watch?v=ysVHkT5QQRM&feature=related

अचानक से रुपेश की निगाह सुखनलता की हाथ घंडी पर गई, जो रात के नौ बजा रही थी। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उन्हें लगा कि यह कशमकश गुरुदेव रवींद्र नाथ टेगौर की नही बल्कि उनकी खुद की जिदंगी है। उन्होनें रवींद्र नाथ टेगौर को श्रृद्धांजली देते हुए प्रतिज्ञा की, कि जीवन में चाहे कितने भी भंवर आए लेकिन दोनो मिलकर अपनी नाव को किनारे जरूर लाएगें।

No comments: