Monday, August 8, 2011

I AM KALAM FROM BIKANER (आई एम कलाम फ्रोम बीकानेर)


सौजन्य-गूगल.कॉम
हिन्दी सिनेमा में रोज़-रोज़ नए प्रयोग हो रहे है। इन्ही प्रयोगों की वजह से फिल्म निर्माता लीक से हटकर कुछ नया कर रहे है। इन्ही प्रयोगों के चलते पर्द पर कई किस्म के नए प्रयोग देखने को मिले,जिसमें से एक प्रयोग है बच्चो को लेकर फिल्म बनाना।


स्टेनली का डिब्बा फिल्म में बाल मजदूरी जैसे अहम मुद्दे को उठाया है तो तारे जमीं पर फिल्म में डिस्लेक्सिया के बारे में बताया गया था। चिल्लर पार्टी फिल्म में एक कुत्ते के लिए बच्चों ने चड्डी आंदोलन ही खडा कर दिया।

इसी कड़ी में हाल ही में रिलिज हुई फिल्म आईएम कलाम भी दिल को छू लेने वाली फिल्म है। बीकानेर में एक गरीब लड़के छोटू (हर्ष मायर) की कहानी पर आधारित यह फिल्म राजस्थानी परिवेश में बनी है। फिल्म में बड़े ख़्वाब देखने वाला छोटू भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम के विचारो से प्रभावित होकर, अपनी लगन और मेहनत से पढाई शुरू कर देता है। पूर्व राष्ट्रपति कलाम को युवाओं का आईकॉन मनाते हुए फिल्म की कहानी लिखी गई है। जिससे लाखों युवा उनकी तरह बनने का सपना देखते हैं। 

छोटू भी कई दिक्कतों के बावजूद बड़ा बनने का सपना देखता है। वह भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. ए पी जे अब्दुल कलाम के जीवन और विचारों से इतना प्रभावित होता है कि, खुद का नाम कलाम रख लेता है। छोटू उर्फ ​​कलाम भाटी दा ढाबे पर काम करता है। जिसका मालिक भाटी (गुलशन ग्रोवर) है। ढाबे के ठीक सामने से  बीकानेर के राजकुमार रणविजय (हतन साद) प्रतिदिन अपने स्कूल की बस लेने आता है। छोटू उर्फ कलाम मौका लगते ही उससे दोस्ती गांठ लेता है। इसके बाद ढाबे पर ही उसकी मुलाकात फ्रांस से आई एक संगीतकार लुसी (बीट्रिस ऑर्डिक्स) से होती है।

फिल्म के डायरेक्टर नीला माधब पांडा ने राजस्थानी परिवेश को इतनी हकीकत के साथ पर्दे पर उतरा है कि कही भी आप को बोरियत का अहसास नही होता।

फिल्म में भाटी का किरदान निभा रहे बैड मैन यानि गुलशन ग्रोवर ने एक निजी समाचार पत्र को दिए इंटरव्यू में कहा कि, आई एम कलाम की बात ही कुछ और है। मैं कह सकता हूं कि आज तक मैंने जितनी भी फिल्में कीं हैं, उनमें से कुछ बेहतर फिल्मों का नाम लेना हो तो, उनमें एक है आई एम कलाम। मुझे बहुत खुशी है कि इस का मैं हिस्सा हूं।

गन्ना चूस के नहीं, हजूर चाय की चुस्की..

असल में फिल्म में भाटी के ढाबे की यह पंच लाइन है।

फिल्म में बाल मजदूरी, बच्चों की अशिक्षा सहित कई मुद्दों को उठाने वाले छोटू उर्फ कलाम को 58वें फिल्म फेयर अवार्ड में बाल कलाकरो में सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का पुरस्कार, गोवा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में ज्यूरी अवार्ड और लॉस एंजिलिस फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट ऑडियंस के पुरस्कार से नवाजा गया है। अब तक इस फिल्म को 12 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।

Tuesday, June 14, 2011

कशमकशः सुखनलता और रुपेश की प्रेमकथा


Google.Pic
सुखनलता ने रुपेश का हाथ कंधे से हटाते हुए कहां, क्या करते हो...बोरा गए हो क्या ?.
रुपेश एकदम सकपका गया और धीरे से उसने सुखनलता के कंधे से अपना हाथ खिंच लिया।

तुमको हो क्या गया है सुखन ?. रुपेश ने रुआसी आवाज में सवाल किया ?.

सिनेमा हॉल में रुपेश की आवाज इको-लाउडस्पीकर बनकर गूंज गई। लेकिन सुखनलता को इसका इल्हाम नही था क्योंकि वह तो बांग्ला मे बनी फिल्म नौका डूब का हिन्दी संस्करण कशमकश देखने में तालीन थी।
सुखनलता और रुपेश अपने-अपने दफ्तर से टाइम निकाल कर गुरूदेव रवींद्र नाथ टैगोर की लघु कहानियों के संग्रह 'गाल्पो गुच्चो' (Galpo Guchho) में प्रकाशित (1912 ) कहानी नौका डूब पर आधारित बांग्ला फिल्म का हिंदी वर्जन ‘कशमकश’ देखने आए थे।

फिल्म प्रारंभ होने पर रुपेश को कुछ नही समझ आ रहा था। लेकिन सुखनलता जानती थी कि ‘नौका डूब’ पर पहली बार 1947 में नितिन बोस ने हिन्दी और बंगाली में फिल्म बनाई थी। जिसके हिन्दी वर्जन में यूसुफ खान यानि अपने दिलीप कुमार और बंगाली संस्करण में अभि भट्टाचार्य नायक की भूमिका में थे। फिर ऋतुपर्णो घोष ने 1920 के कोलकत्ता और बनारस की पृष्ठभूमि में इस फिल्म को बंगाली भाषा में बनाया।  जिसको सुभाष घई ने हिन्दी दर्शकों के लिए ‘कशमकश’ का नाम दिया।

रुपेश फिल्म बीच में ही छोडकर जाना चाहता था, क्योकि उसे फिल्म समझ नही आ रही थी दूसरे तरफ सुखनलता का झिड़कना भी उसे पसंद ना था ।

सुखनलता ने प्रेम से रुपेश को समझाने का प्रयास किया।

दुनिया जो चाहे स्त्री-पुरुष के रिश्ते को अपनी अलग-अलग मनगढ़त परिभाषाएं देती हो लेकिन वह उनके बीच जन्में विश्वास की सच्चाई को कभी नही समझे पाती।

प्यार के रास्ते में स्त्री-पुरुष हर हालत और हर दौर में अपने रिश्तों की एक ही परिभाषा रचते है। जिसका मूल अर्थ होता है समर्पण और त्याग।

रात के सनाटे में जब नायक रमेश (जिशुसेन गुप्ता) अपनी प्रेमिका हेमनलिनी (राइमा सेन) के सामने प्रेम-विवाह का प्रस्ताव रखता है, तो नायिका लोक-लाज की मर्यादा और सभ्य समाज का परिचय देते हुए संयम के साथ रमेश को आश्वासन देती है कि सुबह होने पर वह अपने पिता से बात करेगी।

लेकिन अपने मंझधार में फंसा रमेश भोर होने तक का इंतेजार नही कर पाया और कई वर्षो तक हेमनलिनी से मिलने नही पहुंचा। अंतः हेम के पिता उसका विवाह बनारस के एक डॉक्टर के साथ तय कर देते है। तभी अपने मंझधार की नाव किनारे लगाकर कर रमेश अचानक से बनारस के घाट में हेमनलिनी से मुलाकात करता है।

हेमनलिनी का मन अपने प्रथम प्रेम की ओर झुक जाता है और वह अपनी शादी के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए पिता से आज्ञा मांगती है।

हेमनलिनी के पिता उसके शादी प्रस्ताव पर पुर्नविचार करने की अनुमति नही देते हुए सवाल खड़ा कर देते है, कि जो व्यक्ति रात के अंधेरे में प्रेम-विवाह प्रस्ताव रखकर वर्षो तक गायब रहा हो, तुम उसके साथ कैसे विवाह कर सकती हो ?.

हेमनलिनी ने सहजतापूर्वक जवाब दिया, पिता जी ! वह गायब नही हो गए थे,बल्कि खो गए थे और हमने उन्हें खोजने की कोशिश ही नही की। अब जब वह मिल गए है तो फिर सोच-विचार कैसा।

हेमनलिनी की बात सुनकर रुपेश के शरीर में कंपन सा होने लगा। क्योंकि कुछ ही दिनों पहले सुखनलता ने भी अपने पिता से यही बात कही थी जब रुपेश अचानक से उसे छोड़ कर चले गए थे।

फिल्म खत्म हो चुकी थी, लेकिन रुपेश की आंखों से नीर बह निकले।

गुरुदेव की कहानी पर आधारित फिल्म बने और उसमे गीत-संगीत उच्च कोटि को ना हो तो गुरु को श्रृद्धांजलि कुछ अधूरी सी रह जाती है। इसलिए सुभाष घई ने मशहूर गीतकार गुलजार को फिल्म के हिन्दी गीत लिखने का जिम्मा सौंपा था। जिसके बाद घई ने एक प्रेसवार्ता में कहा कि, "मैं हिन्दी दर्शकों को इस खूबसूरत फिल्म को देखने से वंचित नहीं करना चाहता, इसलिए मैंने इसे हिन्दी में बनाया है और इसके गीत गुलजार साहब से लिखवाए हैं."

गुलजार साहब ने गुरुदेव के बांग्ला गीतो को हिन्दी में ना सिर्फ रुप दिया बल्कि उसमें पूरे बांग्ला समाज को शामिल कर दिया। इन मधुर गीतो को अपने सुरीले संगीत से सजाने का काम किया, राजा नारायण और देव सुजॉय घोष ने। साथ ही फिल्म की पृष्ठभूमि में रवींद्र के संगीत ने दर्शोको का मन मोह लिया।

सुखनलता ने प्रेम-पूर्वक रुपेश के बालों में हाथ फैरा तो वह एक गीत गुनगुनान लगा। जिसे हरिहरण ने गाया था।
खोया क्या जो पाया हीं नही,खाली हाथ की लकीरें है,
http://www.youtube.com/watch?v=l2lCFEbcfWo

फिल्म में श्रेया घोषल ने दो गीतो को अपनी आवाज दी है। फिल्म का पहला गीत उनकी ही आवाज से शुरु होता है।

मनवा भागे रे....सौ सौ तागे रे...
http://www.youtube.com/watch?v=3jcgCHach6A

दूसरा गीत उन्होनें गाया है, तेरी सीमाएं कोई नही है, बहते जाना है,बहते जाना है....
http://www.youtube.com/watch?v=3vnNb3wLl7o&feature=related

सुभाष घई ने गुरुदेव के गीतों में बांग्ला मूलभाव और प्रेम के लिए गुलजार को चुना तो उसमें बंगाली आत्मा डालने के लिए श्रेया के साथ-साथ मधुश्री को भी चुना। और ऐसा करके उन्होनें कुछ गलत नही किया है, क्योंकि नाव मेरी ठहरे गीत में मधुश्री ने हरिहरण के साथ मिलकर वाकई गीत में आत्मा डाल दी।

नाव मेरी ठहरे जाने कहां...घाट होते नही...सागरों में कहीं... 
http://www.youtube.com/watch?v=iP-8kSHIKbo&feature=related

आनंद-लोके, मंगल-लोके नामक गीत फिल्म में बांग्ला भाषा में ही रखा गया है। ऐसा इसलिए किया गया है, क्योंकि अगर इस गीत के बोल और संगीत को बदल दिया जाता तो गुरुदेव की शान मे गुस्ताखी हो जाती। वैसे भी इस गीत को ना जाने कितने गीतकारों ने अपने सुरे दिए है।
http://www.youtube.com/watch?v=ysVHkT5QQRM&feature=related

अचानक से रुपेश की निगाह सुखनलता की हाथ घंडी पर गई, जो रात के नौ बजा रही थी। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उन्हें लगा कि यह कशमकश गुरुदेव रवींद्र नाथ टेगौर की नही बल्कि उनकी खुद की जिदंगी है। उन्होनें रवींद्र नाथ टेगौर को श्रृद्धांजली देते हुए प्रतिज्ञा की, कि जीवन में चाहे कितने भी भंवर आए लेकिन दोनो मिलकर अपनी नाव को किनारे जरूर लाएगें।

Saturday, January 22, 2011

बस ! अम्मा की रसोई नही थी...

नाटकों के महाकुंभ यानि भारत रंग उत्सव का आज समापन हो गया। एक सप्ताह तक चले इसे महाकुंभ का आगाज हुआ था चरणदास चोर के साथ और अंत हुआ फ्रांस के कलाकार लारेंट डेकाल के माइ परफार्मेस के साथ। एनएसडी के प्रवेश द्वार पर पहुंचते ही एक अलग दुनिया का अहसास दिलाने वाले इस उत्सव में भारत की सांझी विरासत को देख कर लोग मंत्रमुग्ध हो गए।

कला और संगीत की इस मंड़ी में देखने के लिए सब कुछ था, हर शाम एक नई सुबह थी और हर सुबह एक नई रात। रंगमंच की इस चकाचौंध ने विदेशी महमानों को भी चकाचौंध कर दिया है। 20 देशों के कलाकारों ने यहां अपनी कला का प्रदर्शन किया। जिसमें देसी-विदेशी कुल 81 नाटक हुए। जिनमें से 23 विदेशी थे। चीन, पाकिस्तान, फ्रांस, यूके, जापान, लंदन, श्रीलंका, संयुक्त राज्य अमेरिका, पोलैंड, बांग्लादेश, नेपाल, इटली के अलावा इस महोत्सव पहली बार शामिल हुए चिली, बोलिविया, इजिप्ट, अर्जेटीना, सर्बिया व यूक्रेन ने अपने प्रस्तृति से सबका मन मोह लिया।

छठे दिन ड्रीम ऑफ तालीम को मुंबई के प्रसिद्ध निर्देशक सुनील शानबाग ने नाटककार सचिन कुंदालकर के आलेख पर अपने कलाकारों के साथ काफी ख़ूबसुरती के साथ पेश किया। इस नाटक के जरीय हाल ही में अलविदा कहने वाले प्रतिभावान निर्देशक चेतन दातार को श्रद्धांजलि है। मंच पर केवल मेज, दो कुर्सियां और एक लैपटाप के द्वारा नाटक का मंचन करने वाले सुनील शानबाग पिछले काफी समय से दिल्ली के दर्शकों के बीच चर्चा का विषय रहे है। सुनील शानबाग ड्रीम ऑफ तालीम में समलैंगिकता जैसे गंभीर विषय बड़ी सावधानी के साथ उठाया है। नाटक के संवादों में समलैंगिकता की प्रक्रिया सटिक तरीके से लिखा गया है। मराठी बोलते बोलते अचानक मां का हिन्दी फ़िल्म के संवाद बोलना दर्शकों का मन मौह लेता है। असल में यह वही पल होते जब दर्शक नाटक में पूरी तरह से डूब जाते है।

स्त्री संबंधों पर आधारित सेंट्रल अकादमी ऑफ ड्रामा, चीन के नाटक The Amorous Lotus Pan इस उत्सव में चर्चा का विषय बना। प्रो. चेन गैंग द्वारा निर्देशित यह नाटक चीनी उपन्यास आउटलाज ऑफ दि मार्श की एक पात्र पैन जिनलियन पर आधारित था।

पैन जिनलियन के माता-पिता उसे बचपन में छोड़ कर चल बसते है। हालत और परिस्थितियों के बीच उसे झेंगदाऊ को बेच दिया जाता है जो एक अमीर आदमी होता और पैन को अपनी दूसरी पत्नि बनाना चाहता है लेकिन पैन जिनलियन इस बात के लिए राजी नही होती। गुस्से से पागल झेंग उसके साथ बलात्कार करता है और एक कायर और बेवाकूफ बौने व्यक्ति वुडा को दे देता है। इसी दौरान पैन वुडा के भाई सौंग के साथ प्यार करने लगती है लेकिन सौंग उसके प्यार को नही अपनाता। समय के साथ साथ कहानी आगे बढ़ती है तो पैन जिनलियन की ज़िदंगी में एक और अमीर व्यक्ति झिमैन आता है। जिसके कहने पर वोह वुडा को ज़हर देकर मार देती है। वुडा की मौत को उसका भाई सौंग बर्दाशत नही कर पाता और प्रतिशोध की ज्वाला में जलकर वह पैन जिनलियन की हत्या कर देता है।

हाल ही रिलिज हुई प्रकाश झा द्वारा निर्देशित फ़िल्म टर्न 30 में नायिका गुल पनाग भी अपने प्रेम को खोने-पाने और अपने भविष्य के प्रति सजग रहने के साथ साथ भारतीय समाज में व्याप्त स्त्री सोच को बयान करती है। फ़िल्म और चीनी नाटक दोनों में ही स्त्री मनोविज्ञान को समझा जा सकता है।

पूरे सप्ताह इतने सुनहरे पल बिताने के बावजूद मेरे मन का एक कोना अभी भी खाली रहे जाता है। Theater Café में लगी गुमटियां पर ना जाने कितने कलाकारों और लोगों ने चाय की चुसकियों का आनंद उठाया होगा। लोगों ने दिल्ली के स्वादिष्ट व्यंजनों का खाट-मूढ़ों पर बैठकर लुत्फ उठाया लेकिन मुझे इस कैफे में अम्मा की रसाई याद आ गई है। शायद नये ज़माने ने पूरानी यादों को कुछ धुंधला सा कर दिया है।

Wednesday, December 22, 2010

हे ! प्रिय चिंतक-शुभचिंतक और अ-शुभचिंतको...

हमारी ज़िदंगी में चिंतक-शुभचिंतक और अ-शुभचिंतकों का होना कितना ज़रूरी है, ये किसी को बताने या छुपाने की आवश्यकता नहीं है। जब भी हम ज़रा सा परेशान होते हैं या फिर किसी मुसिबत में होते हैं.. तो सबसे पहले चिंतक और शुभचिंतक ही हमारा हाल जानने के लिए पहुंचे जाते हैं। उनके आने पर हमारे दिल को भी सुकून मिलता है। हम सोचते हैं कि, चलो इस दुनिया में कोई तो है हमारा ख़ैरख़्वाह। लेकिन उधर हमारे अ-शुभचिंतक यह सोच कर दुःखी हो उठते हैं कि इनके पास इतने सारे शुभचिंतक कैसे हो सकते हैं.. और फिर यही अ-शुभचिंतक तत्काल प्रभाव से एक योजना को अंजाम देते हुए घोषणा कर डालते हैं अगली दफा कोई भी अन्य शुभचिंतक इनके दरवाजे पर नही पहुंच पाए।



इन दिनों में ऐसे ही कुछ शुभचिंतकों और अशुभचितकों के बीच फंसा हुआ हूं। आजकल यही शुभचिंतक-अशुभचिंतक मेरी जिदंगी में किसी हिन्दी सिनेमा के खलनायक की भूमिका निभाने में जुटे हैं। या फिर यू कहूं कि यह डकैत बन गए हैं.. क्योंकि इन्होंने मेरी रातों की नीद और दिन का चैन लूट लिया है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि इनकी प्रताड़ना की रपट किस थाने में जाकर दर्ज कराऊं।


कुछ दिनों पहले मोहर्रम के लिए मैं दिल्ली से बाहर गया.. सर्द रातों में जहां झिंगूर भी बोलने से कतराते हैं.. वहीं अचानक से मेरे फोन की घंटी बजी.. बेध्यानी में उठाया गया फोन जैसे ही कान पर रखा तो दूसरी तरफ मेरा शुभचिंतक बोलना शुरू कर चुका था, " सर ! सर ! .. मैं बोल रहा हूं.. मुझे आज ही पता चला..यह तो बहुत बुरा हुआ.. सर ! मुझे लगता है कि आपके खिलाफ किसी ने चाल चली है..।" इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता कि माजरा क्या है.. फोन कट गया।


शहर की भागती दौड़ती-जिदंगी में हमें वक़्त का अहसास नही होता.. यहां तक कि हमें अपने सोने-जागने तक का टाईम मालूम नहीं रहता। कम से कम मेरे साथ तो कुछ ऐसा ही है.. जब नींद आई तो रात मानकर आंखें मूंद लीं.. और आंख खुली तो सुबह मान ली। मगर गांव देहात में आज भी सारा काम समय के हिसाब से ही होता है। लिहाजा अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे मैं सोकर उठा ही था कि एक और शुभचिंतक ने फोन की घंटी बजाई।


कैसे हो ! अब्बास भाई ! यार मैं (शुभचिंतक) नाईट शिफ्ट में था..और अभी-अभी मैंने (शुभचिंतक) बला-बला साइट पर देखा कि आप जा रहे है ?। यार ! आपने कभी बताया नही.. ऐसी भी भला कोई दोस्ती होती है ?। अब की बार मैंने अपने शुभचिंतक की बात को नींद की दहाड़ से काटते हुए सवाल दाग दिया, भाई ! शुभचिंतक ! मैंने आपको क्या नहीं बताया...?...और इसमें बताने वाली तो कोई बात ना थी.. मुझे आना था तो मैं आ गया.. इसमें नाराजगी कैसी दोस्त...? इतना सुनते ही शुभचिंतक बिफरते हुए बोले, "आप दिल्ली आए.. तो बात होगी..।" इतना कह कर उन्होंने फोन काट दिया।


आज दोपहर दिन के दो बजे.. धूप में बैठा हुआ मैं.. दिल्ली की सर्दी को मुंह चिढ़ा रहा था.. कि अचनाक से मेरे एक शुभचिंतक (या फिर शुभचिंतकनी) का फोन आया.. मेरे गुड नून करते ही उसने बोलना शुरू कर दिया।


यार अब्बास !...?...तुम तो बढ़े ही बेवफा निकले.. अकेले ही बनारस शिफ्ट हो गए.. पिछली मुलाक़ात के दौरान एक बार भी नही बताया.. और आज सुबह जैसे ही मुझे पता चला तो मैं (शुभचिंतक / शुभचिंतकनी) फला-फला साइट पर तुम्हारा नाम देखर दंग रह गई। खैर ! वैसे भी बनारस तो तुम्हारे प्रिय शहरों में शामिल है.. बेटे ! अब तो तुम्हारी मौज़ा ही मौज़ा है।


चिंतक-शुभचिंतक/शुभचिंतकनी से इधर-उधर की दो-चार बातें करने के बाद मैनें अपने परिवार से सबसे पहला सवाल यही किया.." मैं बनारस कब शिफ्ट हो गया...?...मुझे ही इसकी जानकारी नहीं...।"


अंतः हे ! मेरे शुभचिंतकों ! आप सभी का धन्यवाद...साथ ही धन्यवाद देता हूं मैं अपने उन शुभचिंतकों का जिन्होंने रात-बेरात फोन लगाकर अपना अपार प्रेम प्रकट किया।  
     हमारी ज़िदंगी में चिंतक-शुभचिंतक और अ-शुभचिंतकों का होना कितना ज़रूरी है, ये किसी को बताने या छुपाने की आवश्यकता नहीं है। जब भी हम ज़रा सा परेशान होते हैं या फिर किसी मुसिबत में होते हैं.. तो सबसे पहले चिंतक और शुभचिंतक ही हमारा हाल जानने के लिए पहुंचे जाते हैं। उनके आने पर हमारे दिल को भी सुकून मिलता है। हम सोचते हैं कि, चलो इस दुनिया में कोई तो है हमारा ख़ैरख़्वाह। लेकिन उधर हमारे अ-शुभचिंतक यह सोच कर दुःखी हो उठते हैं कि इनके पास इतने सारे शुभचिंतक कैसे हो सकते हैं.. और फिर यही अ-शुभचिंतक तत्काल प्रभाव से एक योजना को अंजाम देते हुए घोषणा कर डालते हैं अगली दफा कोई भी अन्य शुभचिंतक इनके दरवाजे पर नही पहुंच पाए।


इन दिनों में ऐसे ही कुछ शुभचिंतकों और अशुभचितकों के बीच फंसा हुआ हूं। आजकल यही शुभचिंतक-अशुभचिंतक मेरी जिदंगी में किसी हिन्दी सिनेमा के खलनायक की भूमिका निभाने में जुटे हैं। या फिर यू कहूं कि यह डकैत बन गए हैं.. क्योंकि इन्होंने मेरी रातों की नीद और दिन का चैन लूट लिया है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि इनकी प्रताड़ना की रपट किस थाने में जाकर दर्ज कराऊं।


कुछ दिनों पहले मोहर्रम के लिए मैं दिल्ली से बाहर गया.. सर्द रातों में जहां झिंगूर भी बोलने से कतराते हैं.. वहीं अचानक से मेरे फोन की घंटी बजी.. बेध्यानी में उठाया गया फोन जैसे ही कान पर रखा तो दूसरी तरफ मेरा शुभचिंतक बोलना शुरू कर चुका था, " सर ! सर ! .. मैं बोल रहा हूं.. मुझे आज ही पता चला..यह तो बहुत बुरा हुआ.. सर ! मुझे लगता है कि आपके खिलाफ किसी ने चाल चली है..।" इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता कि माजरा क्या है.. फोन कट गया।

शहर की भागती दौड़ती-जिदंगी में हमें वक़्त का अहसास नही होता.. यहां तक कि हमें अपने सोने-जागने तक का टाईम मालूम नहीं रहता। कम से कम मेरे साथ तो कुछ ऐसा ही है.. जब नींद आई तो रात मानकर आंखें मूंद लीं.. और आंख खुली तो सुबह मान ली। मगर गांव देहात में आज भी सारा काम समय के हिसाब से ही होता है। लिहाजा अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे मैं सोकर उठा ही था कि एक और शुभचिंतक ने फोन की घंटी बजाई।


कैसे हो ! अब्बास भाई ! यार मैं (शुभचिंतक) नाईट शिफ्ट में था..और अभी-अभी मैंने (शुभचिंतक) बला-बला साइट पर देखा कि आप जा रहे है ?। यार ! आपने कभी बताया नही.. ऐसी भी भला कोई दोस्ती होती है ?। अब की बार मैंने अपने शुभचिंतक की बात को नींद की दहाड़ से काटते हुए सवाल दाग दिया, भाई ! शुभचिंतक ! मैंने आपको क्या नहीं बताया...?...और इसमें बताने वाली तो कोई बात ना थी.. मुझे आना था तो मैं आ गया.. इसमें नाराजगी कैसी दोस्त...? इतना सुनते ही शुभचिंतक बिफरते हुए बोले, "आप दिल्ली आए.. तो बात होगी..।" इतना कह कर उन्होंने फोन काट दिया।


आज दोपहर दिन के दो बजे.. धूप में बैठा हुआ मैं.. दिल्ली की सर्दी को मुंह चिढ़ा रहा था.. कि अचनाक से मेरे एक शुभचिंतक (या फिर शुभचिंतकनी) का फोन आया.. मेरे गुड नून करते ही उसने बोलना शुरू कर दिया।


यार अब्बास !...?...तुम तो बढ़े ही बेवफा निकले.. अकेले ही बनारस शिफ्ट हो गए.. पिछली मुलाक़ात के दौरान एक बार भी नही बताया.. और आज सुबह जैसे ही मुझे पता चला तो मैं (शुभचिंतक/शुभचिंतकनी) फला-फला साइट पर तुम्हारा नाम देखर दंग रह गई। खैर ! वैसे भी बनारस तो तुम्हारे प्रिय शहरों में शामिल है.. बेटे ! अब तो तुम्हारी मौज़ा ही मौज़ा है।


चिंतक-शुभचिंतक/शुभचिंतकनी से इधर-उधर की दो-चार बातें करने के बाद मैनें अपने परिवार से सबसे पहला सवाल यही किया.." मैं बनारस कब शिफ्ट हो गया...?...मुझे ही इसकी जानकारी नहीं...।"


अंतः हे ! मेरे शुभचिंतकों ! आप सभी का धन्यवाद...साथ ही धन्यवाद देता हूं मैं अपने उन शुभचिंतकों का जिन्होंने रात-बेरात फोन लगाकर अपना अपार प्रेम प्रकट किया।

Saturday, November 6, 2010

इस दीपावली पर महिलाओं की दबंगाई !

नवरात्रों में मां दुर्गा के नौ रूपो को पूजने के बाद अगली बारी आती है दीपावाली में लक्ष्मी पूजा की। दुर्गा और लक्ष्मी पूजा तो हम इसलिए भी करते है क्योंकि यह हमारे देव-देवियों में शामिल है। लेकिन इस बार की दीपावली हम सबके के लिए कुछ खास है। दीपावली इस पूरे सप्ताह में दुनिया-भर के समाचारो में महिलाओं के दबंगाई की ख़बरे ही छाई हुई है। इन महिलाओं ने अपने-2 क्षेत्रों में अच्छी खासी महारत हासिल की हुई है। जिनको हम इस दीपावाली पर महिलाओं की दबंगाई भी कहे सकते हैं।

गोयाकि, महिलाओं का नाम आते ही कही आप पूरा आर्टिकल पढे बिना ही आगे ना निकल जायेइगा। जनाब तो क्या आप नही मिलना चाहेंगे इन रियल लाइफ दबंग महिलाओं से....अगर हां तो फिर बने रहे हमारे साथ।
सबसे पहले नजर डालते है भारतीय मीडिया में छाए उस पर टॉपिक पर जो दिल्ली से प्रसारित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के समाचार चैनल और समाचार पत्रों के संपादको का सबसे प्रिय है। इस विषय पर सभी प्रकार की खबरे कराने के लिए मीडिया समूहों ने अपनी पूरी ताकत झोक रखी है। अब अगर मीडिया ताकत लगाए तो भला वह कोई ऐसे-वेसे ही थोडे लगाऐगा। उसके लिए व्यक्ति भी तो दमदार होना चाहिए ना। और वह है दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा का भारत प्रवास एक तरफ जहां भारत सरकार इस दौरे का राजनीतिक लाभ उठाने की तैयारियों में लगी है तो वही भारतीय मीडिया बराक ओबामा की पत्नि Michelle Obama के दौरे पर तरह-2 की स्टोरी दिखा रही। हर मीडिया समूह, हर रोज एक अलग किस्म की स्टोरी ले कर आ रहा है। एक मीडिया समूह ने तो बराक ओबामा की पत्नि के बारे में यह तक बता डाला कि वह भारत प्रवास के दौरान पूरी तरह भारतीय पोशको में ही नज़र आएगी।  साथ ही अपनी बात को सही साबित करने के लिए इस समूह ने अपने समाचार में Michelle Obama की भारतीय साड़ी पहने हुए एक तस्वीर तक छाप दी। मीडिया में Michelle Obama क्या मथुरा के पेढे खाएंगी या फिर बनारसी पान। दिल्ली में उनके लिए चाट कौन बना रहा है तो कान में बरेली का झुमका किस दुकान का होगा या फिर राजस्थानी लहरियां साड़ी कौन डिजाइयन करेगा आदि आदि स्टोरियों हो रही है। मीडिया भोली-भाली जनमानस को वह सब ऐसे बता रही है जैसे गोयाकि Michelle Obama नही बल्कि किसी बाग में गुल के गुले-गुले हो।
 
दूसरी महिला की बात करे तो वह है एन्टोनिया मैनो। नही समझे सर जी !  मेरा  मतलब ! है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की चौथी बार चुनी गई अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी। इटली के विसेन्जा में एक छोटे से गांव लूसियाना में जन्मी सोनिया गांधी को अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन ने एशिया की सबसे आठ ताकतवर महिलाओं की सूची में शामिल किया है। इसके साथ ही प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब़्स ने दुनिया की 6.8 अरब आबादी में से 68 सबसे ज्यादा ताकवारों लोगों की लिस्ट में भी शामिल किया है, सोनिया गांधी को। राजनीति में सोनिया की दबंगाई यही खत्म नही होती उन पर स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो ने एक किताब " रेड साड़ी" लिख डाली। जिसपर कांग्रेसियों ने जमकर हौ-हव्वा मचाया और अंत में किताब के राईटर को कानूनी नोटिस तक भेज दिया मोरो ने अपनी किताब में लिखा है कि, "राजीव की मौत ने सोनिया को झक-झोर कर रख दिया और उसके बाद वह वापस इटली लौट जाना चाहती थी" यह बात कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को ना गवारगुजरी।  भला यह कैसा हो सकता है कि उनका बहादुर योद्धा पति की मौत के बाद इतना कमजोर कैसे हो सकता है कि टूट कर वापस जाने की सोचे। गोयाकि कार्यकर्ता उतर गए विरोध-प्रदर्शन करने।
 
इस सप्ताह एक और बड़ी खबर आई भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर से। जहां आयरन लेडी ऑफ मणिपुर के नाम से मशहुर ईरोम शर्मिला चानू के अनशन को दस साल पूरे हो गए। पेशे से सामाजिक कार्यकर्ता-पत्रकार और कवि शर्मिला आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल एक्ट (AFSPA) को रद्द करने की मांग कर रही है। आपको याद दिला दे कि भारत में सेना और अर्धसैनिक बलों पर अक्सर AFSPA के दुरूउपयोग के करने के आरोप लगते रहते है। शर्मिला के इ अनशन को जारी रखने का फैसाल भी इसके दुरूउपयोग को लेकर है। जो आज से दस साल पहले एक वृद्ध महिला लेईसांगबाम इबेटोमी और 1988 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार विजेता सिनाम चंद्रमणि की सुरक्षा बलों द्वारा की गई हत्या के आरोप में शुरू किया है।

इस दीपावली पर महिलाओं ने सबसे ज्यादा गदर मचाया विश्व के दो ताकवर देशों में हुए राजनीतिक चुनावों में। दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के सबसे बड़े देश ब्राजील में सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी की उम्मीदवार और विश्व में आयरन लेडी के नाम से मशहुर डिल्मा रॉसेफ ने राष्ट्रपति पद का चुनाव जितकर इतिहास रच डाला। तो दूसरी तरफ अमेरिका में हुए संसदीय चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवार निकी हैली ने डैमोक्रेट पार्टी के उम्मीदवार विसेंट शेहीन को हरा कर दक्षिणी कैरॉलाइना राज्य के गवर्नर और कमला देवी हैंरिस ने कांटे की टक्कर में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार स्टीव कूली को हरा कर कैलीफोर्नियां के अटॉर्नी जनरल पद पर कब्जा कर लिया।
 
यह दोनों महिलाएं भारतीय मूल की है। कमला हैंरिस चैन्नई मूल की ड़ॉ श्यामला गोपालन और अफ्रीकी मूल के अर्थशास्त्री डोनल्ड हैंरिस की पुत्री है। कमला हैंरिस को महिला ओबामा के नाम से भी पुकारा जाता है, क्योंकि कमला को डैमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनाने के प्रस्ताव का समर्थन स्वंय बराक ओबामा ने किया था।

दुनिया में जनसंख्या के अनुपात में सबसे अधिक आबादी रखने वाला चीन भी किसी रूप में पीछे नही रहना चाहता। हाल ही शंघाई की हुरून ने अपनी एक रिपोर्ट में विश्व की तीन सर्वाधिक धनी महिलाओं का चीन का निवासी बताया है ।  इतना ही नही अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन ने अपनी सूची में चीन की नाईन ड्रेगनस पेपर होल्डिंग्स की मालिक झांग यीन को सर्वोच्च स्थान दिया है।
 
विश्व में रियल लाइफ की सबसे बड़ी दबंग है, 20 वर्षीय मारिसोल वालेस गार्सिया। इस रियल लाइफ दबंग को हाल ही में मेक्सिको के सबसे ज्यादा हिंसाग्रस्त शहर गुदाल्पु डिस्ट्रीटो ब्रावो का पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया है। 10,000 की आबादी वाले इस शहर में ड्रग माफिया का एकछत्र राज चलता है। ड्रग माफिया का ख़ौफ इतना है कि इस शहर में पोस्टिंग पाने वाले अधिकतर पुलिसवाले नौकरी छोड़ चुके है।

क्रिमिनोलॉजी की स्टूडेंट गार्सिया को हर महीने 400 डॉलर यानि लगभग 2 लाख रूपये के वेतन पर नियुक्ति किया गया है। पद संभालते हुए अपनी पहली प्रेसवार्ता में उन्होंने कहां कि, हालात बदल सकते हैं अगर हम खुद पर भरोसा रखें, और मैं हालात सुधाकर दुनिया को दिखाना चाहती हूं कि हां, हम ये कर सकते हैं, हम ये नयी पीढ़ी के लिए कर रहैं जो निश्चत रूप से डर के साए में नही रहना चाहती
 
चालिए ! जनाब । मैं तो चला इस दीवापली पर लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ इन देवियों की भी पूजा करने। और आप मनाइए दीपों का पर्व दीपावली।। 

इस दीपावली पर महिलाओं की दबंगाई !

नवरात्रों में मां दुर्गा के नौ रूपो को पूजने के बाद अगली बारी आती है दीपावाली में लक्ष्मी पूजा की। दुर्गा और लक्ष्मी पूजा तो हम इसलिए भी करते है क्योंकि यह हमारे देव-देवियों में शामिल है। लेकिन इस बार की दीपावली हम सबके के लिए कुछ खास है। दीपावली इस पूरे सप्ताह में दुनिया-भर के समाचारो में महिलाओं के दबंगाई की ख़बरे ही छाई हुई है। इन महिलाओं ने अपने-2 क्षेत्रों में अच्छी खासी महारत हासिल की हुई है। जिनको हम इस दीपावाली पर महिलाओं की दबंगाई भी कहे सकते हैं।

गोयाकि, महिलाओं का नाम आते ही कही आप पूरा आर्टिकल पढे बिना ही आगे ना निकल जायेइगा। जनाब तो क्या आप नही मिलना चाहेंगे इन रियल लाइफ दबंग महिलाओं से....अगर हां तो फिर बने रहे हमारे साथ।

सबसे पहले नजर डालते है भारतीय मीडिया में छाए उस पर टॉपिक पर जो दिल्ली से प्रसारित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के समाचार चैनल और समाचार पत्रों के संपादको का सबसे प्रिय है। इस विषय पर सभी प्रकार की खबरे कराने के लिए मीडिया समूहों ने अपनी पूरी ताकत झोक रखी है। अब अगर मीडिया ताकत लगाए तो भला वह कोई ऐसे-वेसे ही थोडे लगाऐगा। उसके लिए व्यक्ति भी तो दमदार होना चाहिए ना। और वह है दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा का भारत प्रवास एक तरफ जहां भारत सरकार इस दौरे का राजनीतिक लाभ उठाने की तैयारियों में लगी है तो वही भारतीय मीडिया बराक ओबामा की पत्नि Michelle Obama के दौरे पर तरह-2 की स्टोरी दिखा रही। हर मीडिया समूह, हर रोज एक अलग किस्म की स्टोरी ले कर आ रहा है। एक मीडिया समूह ने तो बराक ओबामा की पत्नि के बारे में यह तक बता डाला कि वह भारत प्रवास के दौरान पूरी तरह भारतीय पोशको में ही नज़र आएगी।  साथ ही अपनी बात को सही साबित करने के लिए इस समूह ने अपने समाचार में Michelle Obama की भारतीय साड़ी पहने हुए एक तस्वीर तक छाप दी। मीडिया में Michelle Obama क्या मथुरा के पेढे खाएंगी या फिर बनारसी पान। दिल्ली में उनके लिए चाट कौन बना रहा है तो कान में बरेली का झुमका किस दुकान का होगा या फिर राजस्थानी लहरियां साड़ी कौन डिजाइयन करेगा आदि आदि स्टोरियों हो रही है। मीडिया भोली-भाली जनमानस को वह सब ऐसे बता रही है जैसे गोयाकि Michelle Obama नही बल्कि किसी बाग में गुल के गुले-गुले हो।

दूसरी महिला की बात करे तो वह है एन्टोनिया मैनो। नही समझे सर जी !  मेरा  मतलब ! है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की चौथी बार चुनी गई अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी। इटली के विसेन्जा में एक छोटे से गांव लूसियाना में जन्मी सोनिया गांधी को अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन ने एशिया की सबसे आठ ताकतवर महिलाओं की सूची में शामिल किया है। इसके साथ ही प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब़्स ने दुनिया की 6.8 अरब आबादी में से 68 सबसे ज्यादा ताकवारों लोगों की लिस्ट में भी शामिल किया है, सोनिया गांधी को। राजनीति में सोनिया की दबंगाई यही खत्म नही होती उन पर स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो ने एक किताब " रेड साड़ी" लिख डाली। जिसपर कांग्रेसियों ने जमकर हौ-हव्वा मचाया और अंत में किताब के राईटर को कानूनी नोटिस तक भेज दिया मोरो ने अपनी किताब में लिखा है कि, "राजीव की मौत ने सोनिया को झक-झोर कर रख दिया और उसके बाद वह वापस इटली लौट जाना चाहती थी" यह बात कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को ना गवारगुजरी।   भला यह कैसा हो सकता है कि उनका बहादुर योद्धा पति की मौत के बाद इतना कमजोर कैसे हो सकता है कि टूट कर वापस जाने की सोचे। गोयाकि कार्यकर्ता उतर गए विरोध-प्रदर्शन करने।

इस सप्ताह एक और बड़ी खबर आई भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर से। जहां आयरन लेडी ऑफ मणिपुर के नाम से मशहुर ईरोम शर्मिला चानू के अनशन को दस साल पूरे हो गए। पेशे से सामाजिक कार्यकर्ता-पत्रकार और कवि शर्मिला आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल एक्ट (AFSPA) को रद्द करने की मांग कर रही है। आपको याद दिला दे कि भारत में सेना और अर्धसैनिक बलों पर अक्सर AFSPA के दुरूउपयोग के करने के आरोप लगते रहते है। शर्मिला के इ अनशन को जारी रखने का फैसाल भी इसके दुरूउपयोग को लेकर है। जो आज से दस साल पहले एक वृद्ध महिला लेईसांगबाम इबेटोमी और 1988 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार विजेता सिनाम चंद्रमणि की सुरक्षा बलों द्वारा की गई हत्या के आरोप में शुरू किया है।

इस दीपावली पर महिलाओं ने सबसे ज्यादा गदर मचाया विश्व के दो ताकवर देशों में हुए राजनीतिक चुनावों में। दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के सबसे बड़े देश ब्राजील में सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी की उम्मीदवार और विश्व में आयरन लेडी के नाम से मशहुर डिल्मा रॉसेफ ने राष्ट्रपति पद का चुनाव जितकर इतिहास रच डाला। तो दूसरी तरफ अमेरिका में हुए संसदीय चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवार निकी हैली ने डैमोक्रेट पार्टी के उम्मीदवार विसेंट शेहीन को हरा कर दक्षिणी कैरॉलाइना राज्य के गवर्नर और कमला देवी हैंरिस ने कांटे की टक्कर में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार स्टीव कूली को हरा कर कैलीफोर्नियां के अटॉर्नी जनरल पद पर कब्जा कर लिया।

यह दोनों महिलाएं भारतीय मूल की है। कमला हैंरिस चैन्नई मूल की ड़ॉ श्यामला गोपालन और अफ्रीकी मूल के अर्थशास्त्री डोनल्ड हैंरिस की पुत्री है। कमला हैंरिस को महिला ओबामा के नाम से भी पुकारा जाता है, क्योंकि कमला को डैमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनाने के प्रस्ताव का समर्थन स्वंय बराक ओबामा ने किया था।

दुनिया में जनसंख्या के अनुपात में सबसे अधिक आबादी रखने वाला चीन भी किसी रूप में पीछे नही रहना चाहता। हाल ही शंघाई की हुरून ने अपनी एक रिपोर्ट में विश्व की तीन सर्वाधिक धनी महिलाओं का चीन का निवासी बताया है ।  इतना ही नही अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन ने अपनी सूची में चीन की नाईन ड्रेगनस पेपर होल्डिंग्स की मालिक झांग यीन को सर्वोच्च स्थान दिया है।

विश्व में रियल लाइफ की सबसे बड़ी दबंग है, 20 वर्षीय मारिसोल वालेस गार्सिया। इस रियल लाइफ दबंग को हाल ही में मेक्सिको के सबसे ज्यादा हिंसाग्रस्त शहर गुदाल्पु डिस्ट्रीटो ब्रावो का पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया है। 10,000 की आबादी वाले इस शहर में ड्रग माफिया का एकछत्र राज चलता है। ड्रग माफिया का ख़ौफ इतना है कि इस शहर में पोस्टिंग पाने वाले अधिकतर पुलिसवाले नौकरी छोड़ चुके है।

क्रिमिनोलॉजी की स्टूडेंट गार्सिया को हर महीने 400 डॉलर यानि लगभग 2 लाख रूपये के वेतन पर नियुक्ति किया गया है। पद संभालते हुए अपनी पहली प्रेसवार्ता में उन्होंने कहां कि, हालात बदल सकते हैं अगर हम खुद पर भरोसा रखें, और मैं हालात सुधाकर दुनिया को दिखाना चाहती हूं कि हां, हम ये कर सकते हैं, हम ये नयी पीढ़ी के लिए कर रहैं जो निश्चत रूप से डर के साए में नही रहना चाहती

चालिए ! जनाब । मैं तो चला इस दीवापली पर लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ इन देवियों की भी पूजा करने। और आप मनाइए दीपों का पर्व दीपावली।।

अब्बास ताहिर
Tahir.abbas@saharasamay.com